मध्यप्रदेश नव निर्माण मंच: आवास से लेकर बुनियादी सुविधाओं की लड़ाई

देश के शहरी क्षेत्रों में आवास सिर्फ सिर छिपाने की जगह ही नहीं बल्कि सम्मान और सुरक्षा का आधार है। इस विचार को मध्यप्रदेश नव निर्माण मंच पिछले कई वर्षों से शहरी जमीन पर उतारने के लिए काम कर रहा है।

यह मंच आवास जैसे विभिन्न अधिकारों पर प्रदेश के 10 शहरों में कार्यरत है। इन शहरों में इंदौर, जबलपुर, भोपाल, ग्वालियर और सागर जैसे अन्य शहर शामिल हैं। इस मंच का कार्य मुख्य तौर पर इंदौर और सागर में है।

यह कहानी सागर जैसे पिछड़े शहर की है।‌ जहां मध्य प्रदेश नव निर्माण मंच 20 बस्तियों के साथ काम कर रहा है। इस कार्य की कहानी हम इस मंच की सागर टीम के साथ एक संवाद के जरिए समझते हैं। मध्यप्रदेश नव निर्माण मंच की सागर जिला समन्वयक मीना अहिरवार बीते तीन वर्ष से इस मंच के तहत सागर में कार्य कर रही है। 

वे बताती हैं कि, “आवास का मुद्दा हर उस मुद्दे से जुड़ा हुआ है जो मानवीय विकास में बांधा‌ बन‌ रहा है। आवास का मुद्दा सड़क, बिजली, पानी जैसी विभिन्न मूलभूत सुविधाओं से भी जुड़ा हुआ है। हम आवास के साथ सड़क, बिजली, पानी जैसे मुद्दों पर भी कार्य कर रहे हैं। हमारे इस कार्य में खास भूमिका महिलाओं की है। हमारी मांग है कि, शहरी मास्टर प्लान में 15 प्रतिशत भूमि बस्ती में रहने वाले लोगों के लिए हो।”

“जब हमने सागर की 20 बस्तियों में काम शुरू किया तब सबसे पहले महिलाओं को एकजुट किया। फिर, इन बस्तियों में से प्रत्येक बस्ती में 20-20 महिलाओं का समूह तैयार किया। आगे हमने सिटी स्तर की 32 सदस्यीय फेडरेशन भी बनायी। इसके बाद हम शहरी आवास, विभिन्न सुविधाओं और उसकी चुनौतियों पर संवाद की स्थिति में आ पाए। तब संवाद के जरिए बस्ती वासियों की आवास और उससे जुड़ी विभिन्न समस्याओं को समझा। बीत 3 वर्षों में हम सागर में कई कार्य करवा चुके हैं। इसके अलावा अन्य कार्य करने में जुटे हुए हैं।”

आगे मीना बताती हैं कि, “हमने नगरीय भू-अधिकार योजना के तहत हाल ही के कुछ महीनों में रविदास वार्ड (बामनखेड़ी) में 55 परिवारों के पट्टा आवेदन, भगतसिंह वार्ड में 16 पट्टे आवेदन, राठौर बंगला में 9 पट्टे के आवेदन करवाये। इनमें से भगतसिंह वार्ड में 4 लोगों को आवासीय पट्टा और संत रविदास वार्ड (बामनखेड़ी) में 4 लोगों को आवासीय पट्टे प्राप्त हो चुके हैं। बाकी परिवारों के पट्टे भी प्रक्रिया में हैं। 

हमारा प्रयास है कि, अन्य परिवारों को भी जल्द पट्टे दिला पाएं।”

मीना के मुताबिक , “हमारा लक्ष्य बस्तियों के लिए आवास दिलाना बस नहीं है आवास के साथ सड़क जैसे नागरिक सुविधाएं पहुंचाना भी है।

 इसी तर्ज पर हमने सागर के कारीला क्षेत्र में वंचित समुदाय के लिए सड़क निर्माण की करीब 1 वर्ष 6 माह लड़ाई लड़ी। 

शासन-प्रशासन के सामने इस मुद्दे को ज्ञापनों के माध्यम से रखा। तब वहाँ सड़क निर्माण हो सका। कारीला में करीब 25 वर्षों से सड़क निर्माण नहीं किया गया था। ऐसे में बस्ती वासियों को आवा-गमन की परेशानियाँ भोगनी पड़ती थी। ऐसे ही हमने कनेरा देव बस्ती में सड़क निर्माण का मुद्दा 6 माह तक उठाया। तब वहाँ सड़क निर्माण हो पाया।”

श्री विपिन नव निर्माण मंच के युवा कार्यकर्ता हैं और सागर शहर में कम्युनिटी मोबिलाईजर है।

 

वे 1 वर्ष 6 माह से इस मंच से जुड़कर कार्य कर रहे हैं। विपिन कहते हैं कि, “आवास के अधिकार के तहत हमारा काम आवासीय भूमि उपलब्ध करवाना है। क्योंकि, शहरों में घर बनाना तो आसान है पर भूमि हासिल करना कठिन है। अभी तक हम 625 लोगों के लिए आवासीय पट्टा का आवेदन करवा चुके हैं। जबकि, आवासीय पट्टे जैसी कई सुविधाओं के लिए हम 5000 से अधिक लोगों के दस्तावेज़ में सुधार करवा चुके है और नये दस्तावेज भी बनवा चुके हैं। इसमें पैन, आधार, संबल‌, समग्र जैसे दस्तावेज शामिल हैं।” 

“बस्ती वासियों की हम साल में 100 जनसुनवाई जिला कलेक्टर में करवाते हैं। हम आवास के मुद्दे पर 25 आरटीआई भी लगा चुके हैं। हम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए सालाना आम सभा भी आयोजित करते हैं। इस सभा में एक बस्ती से 100 लोग शामिल होते हैं। यानी 20 बस्तियों से 2000 लोग शामिल होते हैं। वहीं, हमने बस्तियों के 28 विकलांग लोगों के लिए शिविर लगाकर उनके यूआईडी कार्ड बनवाए हैं।”  

विपिन आगे बताते हैं कि, “हमारे सामने इस कार्य में कई चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं। जैसे, हमारे कई कार्य स्वीकृत होते हुए भी पूर्ण नहीं हो पा रहे हैं। उन पर सिस्टम टालमटोल कर रहा है। ऐसे ही, बस्तियों की पृत्तसत्तामक सोच हमारे काम में बांधा बन रही है। बस्ती वाले इस कार्य में पूर्ण रूप से संलग्न नहीं होते। बस्तियों हमने क्षेत्रवाद की स्थिति भी देखने मिल रही है।”

 वे कहते हैं कि, “शहर में किसी व्यक्ति के आवास का अधिकार प्रभावित न हो इसकी भी हम निगरानी रखते हैं। हम ग्रामीण आबादी को शहरों में कार्य हेतु आवास की सुविधा भी दिलाते हैं। हम स्वीपर कालोनी, शमघाट के पीछे, उदासी मोहल्ला जैसे बस्तियों अपमानजनक नाम भी बदलवाने कर कार्य कर रहे हैं।”

 हमारी बात होती है नव निर्माण मंच के वालिंटियर के राकेश अहिरवार से भी हुई। वे पिछले 2 साल से मंच की गतिविधियों को समुदाय के बीच बढ़ाने में लगे हैं। राकेश कहते हैं कि, “मध्यप्रदेश नव निर्माण मंच बस्तियों में प्रशिक्षण देने कार्य भी करता है। इस मंच में पूरे शहर में 20-25 हजार लोग जुड़े हैं। पूरे मध्यप्रदेश में 1.5 लाख लोग जुड़े हुए हैं। इस मंच के तहत हमने कई कार्य किए। जैसे, हमने कनेरा देव बस्ती में पानी की पाईप लाईन भी स्वीकृत करवाई है। वहीं, भैसा पहाड़ी बस्ती में हमने बिजली के खंबे भी स्वीकृत करवाए हैं। ऐसे ही आवास के विभिन्न कार्य हम कर रहे हैं।”

 राकेश कहते हैं कि,

 “ बामनखेड़ी (संत रविदास वार्ड) में जब आवास के अधिकार की पहल की तब वहां के निवासियों को मच्छरों की समस्या बहुत थी। ऐसें में हमने पहले मच्छरों की समस्या हल की। फिर, हमने आवास के मुद्दे पर कार्य शुरू किया। हम आवास के मुद्दे पर साल में 24 दस्तावेजीकरण शिविर लगाते हैं। जिसमें आवास की समस्या सुनते और हल करवाते हैं। हम शहरी मास्टर प्लान और 74 वां (नगरीय राज कानून) संशोधन की कार्यशाला भी आयोजित करते हैं।” 

आखिरकार, मध्यप्रदेश नव निर्माण मंच की टीम के कार्य और अनुभव से समझ आता है कि, आवास जीवन‌ जीने की प्राथमिकताओं में शामिल है। जिसके पास आवास नहीं होता उसके पास कुछ खास रह नहीं जाता। आवासीय भूमि और नागरिक सुविधाएं नागरिक अधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़ी है। असलियत में आवास के अधिकार से बुनियादी सुविधाओं के विभिन्न अधिकारों का रास्ता भी खुलता है। नव निर्माण मंच का कार्य यह अहसास भी करवाता है कि, एक अच्छी शहरी योजना और समग्र विकास की पहचान आवास, सड़क, बिजली, पानी के उचित अधिकारों से होती है।

 ( लेखक सामाजिक मुद्दों के पत्रकार हैं , संपर्क : 62631 97989 )

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I am a journalist having over 25 years of experience in journalism. Having worked for several national dailies and as correspondent in All India Radio, I am currently working as a freelancer.

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