आदिवासी बच्चों की मौत से स्वास्थ्य सुविधाओं पर उठते सवाल!

रिपोर्ट:- सतीश भारतीय

मध्यप्रदेश के बालाघाट में बीमारियों से आदिवासी बच्चों की मौतें बढ़ रही है। बच्चों की मौतें जून माह से शुरू हुई। पहले मौत का आंकड़ा 8 सामने आया। फिर, मौतों की संख्या 19 बताई गई।अब दावा किया जा रहा है कि 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है।

यह मौतें बालाघाट के बिरसा विकासखंड की बताई जा रही हैं। बिरसा के ग्राम बोन्दारी, कुंडेकसा और कोरका सहित कई गांव के आदिवासी बच्चे जान गंवा चुके हैं। ये गांव जिला मुख्यालय से करीब 60 से 90 किमीं की दूरी पर बसे है। जहां स्वास्थ्य सहित कई मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।

बीमारी से मौतों की स्थिति देखने पर सामने आता है कि, बोंदारी गांव में मृतक रूपलाल धुर्वे की मौत 16 जून, पूजा धुर्वे की मौत 28 जुलाई, सचिन मरकाम की मौत 31 जुलाई, प्रियंका धुर्वे की मौत 12 अगस्त को हुई। जबकि, कोहनीमोडटोला गांव के लमनिन धुर्वे की मौत 26 जून और साहिल धुर्वे की मौत 27 जून को हुई।

वहीं, कोन्डेकसा गांव में प्रीति मरकाम की मौत 23 जुलाई और अरविंद धुर्वे की मौत 6 अगस्त को हुई। ऐसे ही मछुरदा गांव में सुरज मरकाम की मौत 1 अगस्त और रोवन‌ धुर्वे की मौत 3 अगस्त को हुई। इसके अलावा अन्य गांवों सहित अब तक 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत का दावा किया जा रहा है।

इन मौतों का आंकड़ा जब 8 था तब 12 अगस्त 2026 के दिन कार्यालय कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट का एक पत्र कमांक/जन स्वास्थ्य/08/2026/7165 सामने आया था।

इस पत्र में उल्लेख था कि, बालाघाट जिले के विकासखण्ड बिरसा के सेक्टर सोनगुड्डा के अंतर्गत ग्राम बोन्दारी, कुण्डेकसा एवं कोरका में माह जून 2026 से माह अगस्त 2026 तक मौसमी बीमारी, सर्दी, खांसी, बुखार, शरीर में चट्टे, दाने, मिजल्स, पेलसीफेरम मलेरिया आदि का प्रकोप पाया गया है। जिसके कारण 08 मृत्यु हुई है।

पत्र में यह भी दर्ज था कि, क्षेत्र में बीमारी की सूचना प्राप्त होने पर घर-घर जाकर सर्वेक्षण कराया जा रहा है, जिसमें 20 सर्वेक्षण दल, 10 चिकित्सा अधिकारी के माध्यम से कराये जाने के साथ ही ग्राम कुण्डेकसा में 05 बिस्तरीय अस्थायी अस्पताल स्थापित किया गया है।

वहीं, 100 बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया था, जिनमें से 93 बच्चों को उपचार उपरांत स्वस्थ्य होने पर डिस्चार्ज किया गया है। शेष 07 बच्चे अस्पताल में भर्ती रहकर उपचाररत है। एहतियात के तौर पर 08 अन्य बच्चों को अस्पताल लाया गया है इस प्रकार कुल 15 बच्चे अस्पताल में उपचाररत् है। सभी बच्चे खतरे से बाहर है एवं सभी की स्थिति सामान्य है।

इसके आगे पत्र में यह भी दर्ज है कि, अब तक कुल 372 रोगी विभिन्न बीमारियों के मिले, जिसमें 93 को अस्पताल में एवं कुल 272 को घर पर ही रखकर उपचार किया गया है।

जब हम बच्चों की मौत वाले कुन्डेकसा जैसे कई गांव देखते हैं तब दिखाई देता है कि, आदिवासी लोगों के कच्चे घर बास, लकड़ी, मिट्टी के बने हैं। घर इतने खुले भी है कि, उनमें सांप, बिच्छू जैसे जहरीली जीव और कीड़े-मकोड़े घुसने की भयंकर गुंजाइश है।

घरों के पास गंदगी और भयंकर मच्छर है। घरों की दीवारों से लेकर धरती तक सीड़न की दशा है। गांव में पानी, बिजली का संकट है। गाँव खुले में शौच मुक्त नहीं हुए हैं। और तो और महिलायें घर के बर्तन सार्वजनिक नलों पर धोती मिलती हैं। वहीं, घरों में ढंग के कपड़े, ओढ़ने बिछाने के कपड़े तक नहीं है।

स्वास्थ्य सुवधा की कमी है। उचित खाना नहीं है। इसके साथ खास बात यह है कि, आदिवासी लोगों के पास एक सम्मान जनक रोजगार भी नहीं हैं। ये वे परिस्थियाँ हैं जिनके प्रभाव से आदिवासी बच्चे बीमारियों से ग्रसित हुए और मौत के मुहँ में समां गए।

हालांकि, मृतक बच्चों के मामले को देखते हुए प्रशासन ने स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाई हैं। वहीं, मुख्यमंत्री ने मृतक बच्चों के परिजनों को मुआवजा देने की घोषणा की है। अब तक कई लोगों को मुआवजा दिया भी जा चुका है।

मृतक बच्चों के पीड़ित परिजन बातचीत में अपना दर्द बताते हैं। कोहनीमोडटोला गांव के सम्हारू धुर्वे एक ऐसे पिता है जिन्होंने अपने 2 बच्चों की जिंदगी गंवा दी है। इस दुःख की घड़ी में वह कहते हैं कि, “मेरे बेटे लमनिन (14) और साहिल (1) की मौत हो चुकी है। मैंने बच्चों को झाड़ फूंक भी करवाया था और पंडा के पास भी ले गया था। पर कोई आराम नहीं मिला तो बच्चों को डाबरी के अस्पताल ले गया। वहां इलाज नहीं हुआ। फिर, सोनगुड्डा के अस्पताल भी ले गया। लेकिन मेरे 2 बच्चों की जान मैं बचा नहीं पाया।”

आगे वे दर्द भरे लहजे में कहते हैं कि, “पहले मेरे 14 साल के लमनिन की मौत 26 जून 2026 को हुई। बहुत दुख हुआ। यह दुःख तब और गहरा गया जब एक साल के बेटे एक साहिल की 27 जून 2026 को मौत हो गयी।”

वहीं, बोंदारी गांव के चैन सिंह को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन को खोने का दर्द बहुत पीड़ा दे रहा है। उनके बेटे की मृत्यु बीमारी की स्थिति से 31 जुलाई 2026 को हो गयी। वे दर्द भरे लहजे में कहते हैं कि, “मेरे बेटे सहित अन्य बच्चों का जान गंवाना असहनीय दर्द दे रहा है। हमारे गांव में पानी की बहुत परेशानी है। हम गंदा पानी पीते। यही गंदा पानी बीमारी और मौत की वजह बना है। जबकि, स्वास्थ्य सुविधाओं की भी कमीं है।”

बोंदारी गांव के ही ग्रामीण जौनसिंह मरकाम दर्द जाहिर करते हुए कहते हैं कि, “गांव‌ में बच्चों की मौते हुई उन पर यकीन‌ नहीं हो रहा। पहले तो लग रहा था बच्चों को बरसात की मौसमी बीमारी हो सकती है। लेकिन, जब बच्चों की मौतें होने लगी तब गांव में मातम पसर गया। गांव की पंचायत ने बीमारियों‌ का मामला स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाया।”

अडोरी गांव के सरपंच परसराम धुर्वे इस पूरे घटनाक्रम पर अपना मत रखते हुए कहते हैं कि, “जून माह से गांव‌ में बच्चे बीमार हो रहे थे। यह जानकारी मेरे सामने 21 जुलाई को आई। इस मामले का मैंने ढंग से संज्ञान लिया। फिर, अधिकारियों से मामले पर बात की और स्वास्थ्य टीम गांव पहुंची। फिर, भी हमें दुःख है कि, बच्चों की जान को बचाया नहीं जा सका।”

बैहर विधानसभा के विधायक संजय ऊईके इस पूरे मामले में कहते हैं कि, “आदिवासी बच्चों की मौत का प्रमुख कारण कुपोषण हैं। कुपोषण के कारण कई बीमारियाँ हुई जिनसे बच्चों की मौत हो गई।

इस संबंध में विधायक श्री उईके ने विधानसभा में 18 बार यहाँ की स्वास्थ्य सेवा को लेकर सवाल किया है। मेडिकल कर्मचारियों की भर्ती के लिए आवाज उठाई। मगर, सरकार ने ध्यान नहीं दिया। “हम सरकार के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे थे स्वास्थ्य सेवा की मांग कर रहे थे सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए था।”

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