भारत में सांसदों को नहीं है जलवायु परिवर्तन की चिंता?

– (अमिताभ पाण्डेय)

इन दिनों सारी दुनिया के देश जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से परेशान हैं। इस वैश्विक समस्या के समाधान को लेकर देश – दुनिया में लगातार चर्चा और चिंतन चल रहा है।

भारत में भी सरकार, समाज और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जलवायु परिवर्तन को लेकर तरह तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

ऐसे अभियान में भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारी , विभिन्न राज्यों के मंत्री – मुख्यमंत्री, सांसद – विधायक, पर्यावरण संबंधी विषय विशेषज्ञ सामाजिक कार्यकर्ता, आमजन भी शामिल होते रहते हैं।

जलवायु परिवर्तन को लेकर विभिन्न कार्यक्रम में चिंता प्रकट करने वाले हमारे जनप्रतिनिधि इस विषय पर कितने गंभीर हैं – यह महत्वपूर्ण सवाल है। इसका जवाब हमें सेंटर फार फाइनेंशियल एकाउंटेंबिलीटी द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट में मिल सकता है।

यह रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश के सांसद भले ही सेमिनार, वर्कशाप के दौरान मंच, माइक पर जलवायु परिवर्तन को लेकर कितनी ही बातें करें लेकिन संसद में वे इस विषय को लेकर गंभीर नहीं है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर सांसदों ने सदन में सवाल जवाब के लिए विशेष रुचि नहीं दिखाई है।

भारत की संसद में पर्यावरण को लेकर उतने सवाल जवाब नहीं हो रहे हैं जितने इस समय होना बहुत जरूरी है। संसद का कीमती समय गैरजरूरी बहस , हंगामे के साथ ही जलवायु परिवर्तन की तुलना में कम महत्वपूर्ण विषय पर बहस में खत्म हो रहा है।

हाल ही में जारी की गई इस रिपोर्ट का नाम Climate on the Floor (सदन में जलवायु) है। इसमें पेरिस समझौते के बाद से भारत में पर्यावरण पर संसदीय चर्चा को लेकर विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले एक दशक में जलवायु को लेकर महत्वाकांक्षी वादे तो किए हैं लेकिन संसद में उन पर कितनी बार चर्चा हुई ? कितनी बार सवाल पूछे गए हैं ? रिपोर्ट में इसके बारे में विस्तार से जांच पड़ताल की गई है।

यह रिपोर्ट सांसद और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा जारी की गई ।

इस अवसर पर जलवायु विशेषज्ञ सौम्या दत्ता, पर्यावरण वकील रित्विक दत्ता, माध्‍यम की मानसी वर्मा और रिपोर्ट की लेखिका हाजिरा पुथिगे सहित अन्य पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। यह रिपोर्ट हाजिरा पुथिगे ने संसद में पर्यावरण संबंधी सवाल जवाब की जांच पड़ताल के बाद तैयार की ।

इस रिपोर्ट में 2015 से 2025 के बीच पूछे गए 8 हजार 702 संसदीय सवालों का विश्लेषण किया गया है, ताकि यह देखा जा सके कि संसद के पटल पर जलवायु परिवर्तन को कितनी जगह मिली है।

हाजिरा पुथिगे की रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि वर्ष 2015-2025 के बीच भारत की संसद में केवल 3.3% सवाल ही जलवायु और पर्यावरण से संबंधित थे।

इसी प्रकार जलवायु से जुड़े 37.7% सवाल स्वच्छ ऊर्जा और डीकार्बोनाइजेशन पर केंद्रित थेइन सवालों में जलवायु वित्त का हिस्सा केवल 0.3% थारिपोर्ट के अनुसार भारत में चरम मौसमीय घटनाओं के बाद जलवायु प्रभावों पर ध्यान बढ़ा, जो निरंतर जुड़ाव के बजाय संकट-प्रेरित निगरानी की ओर इशारा करता है।

भारत की संसद में जलवायु वित्त और चरम मौसम से लेकर जंगल, अनुकूलन, ऊर्जा और वैश्विक जलवायु गवर्नेंस तक के सवाल का विश्लेषण करती यह रिपोर्ट और इसके निष्कर्ष चिंताजनक हैं।

यह रिपोर्ट साफ साफ बताती है कि भारत में सांसद जलवायु परिवर्तन की समस्या को सर्वोच्च प्राथमिकता में नहीं रखते हैं। हमारे सांसदों ने संसद ने क्या सवाल पूछे हैं ? उन्होंने किन मुद्दों को प्राथमिकता दी है ? क्या अब भी सांसदों के लिए जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हाशिये पर है ? आखिर क्या कारण है कि भारतीय संसद में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पर्याप्त सवाल जवाब, चर्चा और चिंतन क्यों नहीं हो रहा है ?

इसी से जुड़ा एक सवाल यह भी है कि यदि हमारे सांसद जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर सदन में अब भी पर्याप्त सवाल नहीं उठाएंगे तो फिर कब उठाएंगे? जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभाव प्रकृति, पर्यावरण के साथ ही हमारे जनजीवन और सामाजिक, आर्थिक स्थिति को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ऐसे में लगातार गंभीर होती समस्या के प्रति सांसदों की उदासीनता बेहद दुखी करने वाली है। जलवायु परिवर्तन के प्रति सांसद की यह उदासीनता पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को निराश करती है।

यह पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर https://cenfa.org/climate-on-the-floor/उपलब्ध है।

( पत्रकार अमिताभ पाण्डेय पर्यावरण संबंधी विषय पर लिखते हैं । संपर्क : 9424466269 )

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I am a journalist having over 25 years of experience in journalism. Having worked for several national dailies and as correspondent in All India Radio, I am currently working as a freelancer.

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