मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में अति विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय के 41 बच्चों की कुपोषण से मौत गंभीर सवाल खड़े करती है।
इस मामले में पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने गहरा दुख प्रकट किया है।
श्री सकलेचा ने इस घटनाक्रम के लिए शासन-प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार को जिम्मेदार बताया है। श्री सकलेचा ने मांग की है कि बैगा बच्चों की मौत की उच्चस्तरीय जांच तथा बैगा विकास के लिए किए गए बजट प्रावधान और उसके उपयोग का वित्तीय एवं सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
उन्होंने कहा कि यह केवल बच्चों की मौत नहीं, बल्कि बैगा समुदाय की बदहाल स्थिति और सरकारी योजनाओं की विफलता का आईना है।श्री सकलेचा ने कहा कि 2011 की जनगणना में बैगा आबादी 4.15 लाख थी। वर्ष 2019 में 82,258 बैगा परिवार थे, जो 2025 में घटकर 72,788 रह गए। छह वर्षों में करीब 9,500 परिवारों कम हो गए।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक बैगा सहित अति विशेष पिछड़ी जनजातियों के विकास के लिए ₹3,410 करोड़ का प्रावधान किया गया। इसके अलावा अन्य विभागों की राशि और केंद्र से प्रतिवर्ष लगभग ₹100 से ₹160 करोड़ मिलने के बावजूद कुपोषण समाप्त नहीं हुआ।
सवाल है कि इतनी बड़ी राशि के बाद भी बैगा बच्चों की मौत क्यों हो रही है और परिवारों क्यों कम हो रहे है? श्री सकलेचा ने कहा कि शासन ने विशेष पिछड़ी जनजाति की करीब 5 लाख महिलाओं को लाड़ली बहना योजना की कंडिका 4.4 की विधि-विरुद्ध एवं योजना के उद्देश्य के प्रतिकूल व्याख्या करते हुए केवल इसलिए अपात्र कर दिया कि उन्हें आहार अनुदान योजना के तहत वर्तमान में ₹1,500 प्रतिमाह मिल रहे हैं ।
जबकि प्रशासनिक सुविधा के लिए राशि परिवार की महिला मुखिया के बैंक खाते में अंतरित की जाती है । उन्होंने कहा कि लाड़ली बहना की कंडिका 4.4 के तहत ₹1,000 या अधिक की राशि प्राप्त करने वाली महिला को अपात्र माना गया है, लेकिन आहार अनुदान महिला की व्यक्तिगत आय नहीं, बल्कि समुदाय में कुपोषण दूर करने के उद्देश्य से परिवार को दिया जाने वाला अनुदान है , इसे महिला का व्यक्तिगत हितलाभ मानना योजना की मूल भावना के विपरीत है।

श्री सकलेचा ने कहा कि आहार अनुदान का उद्देश्य परिवार में कुपोषण दूर करना है, जबकि लाड़ली बहना का उद्देश्य महिलाओं का आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण करना है।
दोनों योजनाओं के उद्देश्य अलग और स्वतंत्र हैं। इसलिए एक योजना के अंतर्गत परिवार के लिए दिए जाने वाले पोषण अनुदान को आधार बनाकर महिलाओं को दूसरी योजना से बाहर करना समानता, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की भावना के विपरीत है।
श्री सकलेचा ने कहा कि करोड़ों का बजट खर्च होने के बाद भी बैगा बच्चे कुपोषण से मरें और उनकी माताओं को महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण की लाड़ली बहना योजना से बाहर कर दिया जाए—इससे बड़ी विडंबना क्या होगी ?





