मध्यप्रदेश में पर्यावरण के लिए कम हुआ बजट 

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(अमिताभ पाण्डेय)

भोपाल ।

इन दिनों प्राकृतिक संसाधनों के बेहिसाब दोहन से पूरी दुनिया के सामने लगातार बिगड़ते पर्यावरण को बचाना, बेहतर बनाना एक बड़ी चुनौती है। 

पर्यावरण को बचाने बेहतर बनाने के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों की सरकारें अपने-अपने स्तर पर लगातार काम कर रही हैं। दुनिया भर के देश पर्यावरण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए लगातार cop29 जैसे बड़े-बड़े आयोजन कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में आए बदलाव का असर भी आम जनता पर सीधा हो रहा है।

बिगड़ता पर्यावरण हमारे सामाजिक आर्थिक ताने-बाने को भी बहुत नुकसान पहुंचा रहा है यही कारण है कि विभिन्न देशों की सरकार पर्यावरण को बचाने और बेहतर बनाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रमों का संचालन कर रही है रक्षा स्वास्थ्य शिक्षा की तरह पर्यावरण को लेकर अलग-अलग देशों के सरकारों की चिंता उनके बजट में भी जाहिर होती है। 

पर्यावरण को लेकर भारत में भी नई-नई योजनाएं नए-नए कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं और इसके लिए शासन की ओर से बजट प्रावधानों को योजना के अनुसार बढ़ाया जा रहा है। 

इधर मध्य प्रदेश में इस वर्ष जो बजट आया है उसे बजट में राज्य सरकार की चिंता पर्यावरण के प्रति कुछ कम दिखाई देती है शायद यही कारण है कि इस वर्ष के बजट प्रावधान में पर्यावरण के लिए जो राशि रखी गई है वह पिछले बजट की तुलना में 20% काम है इस साल जो बजट प्रस्तुत किया गया उसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए जो कुल राशि रखी गई है वह कुल बजट का मात्र 0.007% है।

इसका अर्थ यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वित्तीय वर्ष 2026-2027 में राज्य शासन के बजट में कुल बजट की एक प्रतिशत राशि भी वह किए जाने का प्रावधान नहीं है ।

मध्य प्रदेश के बजट से यह खुलासा होता है कि सरकार पर्यावरण को लेकर अधिक गंभीर नहीं है। शायद यही कारण है कि अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों को यह बजट निराश करता है। 

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने हाल ही में राज्य विधानसभा में 2026–27 का ₹4 लाख 38 हजार 317 करोड़ का बजट पेश किया। इसे राज्य का पहला ग्रीन बजट ढांचा बताया गया, लेकिन वास्तविक आवंटन में जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर कमियाँ दिखाई देती हैं।

इस बजट में पर्यावरण संरक्षण के लिए मात्र ₹31 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के ₹39 करोड़ से लगभग 20 प्रतिशत कम है। वहीं वन संरक्षण हेतु ₹6,121 करोड़ का बजट रखा गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि सरकार वन संरक्षण को प्राथमिकता दे रही है, लेकिन व्यापक पर्यावरणीय और जलवायु संकट को नजरअंदाज कर रही है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि बजट में जलवायु परिवर्तन के लिए कोई स्पष्ट बजट लाइन नहीं दी गई है। न तो अनुकूलन (Adaptation) और न ही शमन (Mitigation) कार्यक्रमों के लिए अलग प्रावधान किया गया है। कुल बजट का मात्र 0.007 प्रतिशत पर्यावरण संरक्षण पर खर्च किया जा रहा है, जो नगण्य है।

यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसम की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2022 से 2025 तक मध्यप्रदेश ने 598 दिनों में गंभीर मौसम का सामना किया, यानी लगभग हर तीसरे दिन। इस दौरान 1 हजार 439 लोगों की मौत हुई, 82 हजार 170 हेक्टेयर फसलें बर्बाद हुईं, 20 हजार 000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए और 6 हजार पशुओं की मृत्यु हुई। वर्ष 2024 में ही प्रदेश ने 176 चरम मौसम वाले दिन दर्ज किए, जिनमें 353 लोगों की मौत हुई और 25 हजार 170 हेक्टेयर प्रभावित हुए।

अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की स्थिति और भी कमजोर दिखती है। राजस्थान ने अपने पहले ग्रीन बजट 2025–26 में कुल निधियों का 11.34 प्रतिशत सतत विकास और जलवायु परिवर्तन के लिए आवंटित किया। गुजरात ने जलवायु परियोजनाओं के लिए ₹165 करोड़ का प्रावधान किया। इसके विपरीत मध्यप्रदेश ने पर्यावरण बजट घटा दिया और जलवायु परिवर्तन का कोई उल्लेख नहीं किया।

राज्य ने हाल ही में मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना 2023–28 तैयार की है, जिसमें ₹97,000 करोड़ का बजट प्रस्तावित है। लेकिन पर्यावरण विभाग का बजट मात्र ₹31 करोड़ है। यह गंभीर असमानता दर्शाती है कि कार्ययोजना के वित्तपोषण को लेकर स्पष्टता नहीं है। संभावित धन स्रोतों—केंद्रीय योजनाएँ, अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, निजी निवेश—का उल्लेख अस्पष्ट है। इस अनिश्चितता के कारण कार्यान्वयन बाधित होता है।

बजट में आपदा राहत के लिए ₹715 करोड़ और राज्य आपदा निधि हेतु ₹564 करोड़ का प्रावधान किया गया है, लेकिन इनमें भी जलवायु दृष्टिकोण का समन्वय नहीं दिखता।

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ की मानें तो इस बजट से यह स्पष्ट है कि सरकार जलवायु संकट की गंभीरता को प्राथमिकता नहीं दे रही है। जब पूरी दुनिया जलवायु संकट से निपटने के लिए निवेश बढ़ा रही है, तब मध्यप्रदेश सरकार बिना जलवायु परिवर्तन का नाम लिए बजट पारित कर रही है। इसका सबसे बड़ा असर हाशिए पर खड़े समुदायों—दलित, आदिवासी, किसान, मछुआरे, महिला समूह, दिव्यांग और एलजीबीटीक्यू समुदाय पर पड़ रहा है, जो सीधे जलवायु आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं और जिनके पास संसाधनों की भारी कमी है।

पर्यावरण से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कुमार मानते हैं कि मध्यप्रदेश का 2026–27 बजट ग्रीन बजट कहलाने के बावजूद जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं करता। यह न केवल सरकार की गंभीरता की कमी को दर्शाता है बल्कि भविष्य में बढ़ते जलवायु संकट से निपटने की क्षमता को भी कमजोर करता है। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट बजट लाइन, समर्पित वित्तीय रणनीति और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करे, ताकि जलवायु कार्ययोजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और कमजोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान की जा सके।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं । 

संपर्क : 9424466269

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