अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से भारत को नुकसान

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नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भारत को अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते पर असहमति जाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत में विभिन्न वर्गों के लिए बहुत नुकसानदायक साबित होगा।
श्री सिंह ने कहा कि वाशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर 5 फरवरी को जारी तथा अमेरिकी अधिकारियों द्वारा मीडिया को दिए बयान एवं भारत सरकार द्वारा 6 फरवरी को जारी प्रेस रिलीज से पता चला कि भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौता किया है।

संयुक्त बयान को मैने ध्यान से पढ़ा है और भारत के किसान के भविष्य को लेकर चिंतित हूं। मैने इस डील में निम्नलिखित बातों को पाया है। आशा करता हूं कि भारत के किसान भाई इस पर गौर करेंगे। यह राजनीति नहीं, मेरी भारत माता और भारत माता के किसानों के प्रति जिम्मेदारी है। इस डील से जो नुकसान हो सकते हैं वे निम्नलिखित हैं ।”

आर्थिक क्षति और सब्सिडी का संकट :
1 लाख करोड़ रूपये का डेयरी घाटा: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत का डेयरी बाजार अमेरिका के लिए खुलता है, तो भारतीय किसानों को सालाना 1 लाख करोड़ रुपए का सीधा नुकसान होगा।
सब्सिडी की विशाल खाई: अमेरिकी किसान को एक साल में औसतन $1,83,488 (लगभग 1.5 करोड़ रुपए) की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसान को ‘पीएम किसान’ के तहत मात्र 6,000 रुपए मिलते हैं। यह अंतर 122 गुना से भी अधिक है।
अपूर्ण प्रतिस्पर्धा:
50% से 215% तक की सब्सिडी से लैस अमेरिकी उत्पादों के सामने भारत का गरीब किसान टिक नहीं पाएगा। यह मुक़ाबला दो बराबरी के खिलाड़ियों के बीच नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट मशीन और एक छोटे किसान के बीच है।

ऐतिहासिक घाटा: आर्थिक विकास और सहयोग संगठन (OECD) के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में भारतीय किसानों को नीतिगत विसंगतियों के कारण पहले ही 111 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। यह नई डील इस वित्तीय बोझ को और बढ़ाएगी।
व्यापारिक असमानता : एकतरफा टैरिफ कटौती व्यापारिक असमानता का ज्वलंत नमूना है।
(1) संयुक्त बयान के अनुसार, भारत अमेरिका के सभी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों (फल, नट्स, सोयाबीन तेल) पर टैरिफ जीरो (0%) या कम करेगा।

(2) इसके विपरीत, अमेरिका भारतीय टेक्सटाइल, लेदर और फुटवियर जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर 18% का भारी टैरिफ जारी रखेगा।
500 बिलियन डॉलर का वित्तीय बोझ: भारत ने अगले 5 वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, विमान और तकनीक के क्षेत्र में 500 बिलियन डॉलर (42 लाख करोड़ रुपए) के आयात का वादा किया है, जिससे व्यापार घाटा भारत के प्रतिकूल होगा।

नॉन-टैरिफ बैरियर्स: भारत अमेरिकी मेडिकल डिवाइसेज और ICT सामानों के लिए अपने कड़े नियमों और लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को हटाने पर सहमत हो गया है, जिससे घरेलू छोटे उद्योगों पर संकट आ सकता है।

विशिष्ट फसलों पर भविष्य का प्रभाव :
(1) कपास (Cotton) की तबाही: पिछले साल अगस्त में टैरिफ जीरो होते ही अमेरिकी कपास का आयात 95% बढ़ गया और दो दिन में घरेलू दाम ₹1,100 प्रति क्विंटल गिर गए। भविष्य में कपास किसान पूरी तरह खेती छोड़ सकते हैं।
(2) सेब का संकट: डील के तहत ताजे फलों पर टैरिफ कम होने से वाशिंगटन और यूरोपीय सेब भारतीय बाजार में भर जाएंगे, जिससे पहाड़ी राज्यों हिमाचल एवं कश्मीर की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो सकती है।
(3) सोयाबीन और खाद्य तेल: अमेरिका से सस्ते सोयाबीन तेल का आयात बढ़ने से भारत का ‘तिलहन मिशन’ (Oilseed Mission) प्रभावित होगा और किसान सोयाबीन की खेती से पीछे हट जाएंगे।
(4) मक्का और एथेनॉल का दबाव: अमेरिका अपने सरप्लस मक्का को भारत में खपाने के लिए एथेनॉल बाजार खोलने का दबाव बना रहा है, जिससे स्थानीय मक्का उत्पादकों के दाम गिरेंगे।

सामाजिक और रणनीतिक परिणाम ;
(1) बेरोजगारी का आयात: भोजन का आयात करना असल में “बेरोजगारी का आयात करना” है। खेती छोड़ने वाले करोड़ों किसानों के लिए शहरों में रोजगार का कोई ठोस विकल्प नहीं है।
(2) खाद्य सुरक्षा पर खतरा: यदि भारत अनाज और डेयरी के लिए आयात पर निर्भर हो गया, तो भविष्य में वैश्विक कीमतों में उछाल आने पर भारत की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
(3) ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कैश की कमी: अमेरिकी कृषि सचिव के अनुसार, यह डील “ग्रामीण अमेरिका में कैश पंप करेगी”। इसका सीधा अर्थ है कि यह कैश भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था से बाहर निकाला जाएगा।
(4) एमएसपी (MSP) का महत्व कम होना: जब अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ता माल जीरो ड्यूटी पर आएगा, तो सरकार के लिए घरेलू स्तर पर एमएसपी सुनिश्चित करना लगभग असंभव हो जाएगा।
(5) अमेरिका से आने वाले डेयरी उत्पाद में मांसाहारी पशुओं के दूध से बने डेयरी उत्पाद भी शामिल होंगे। इनका भी आयात होगा। ऐसे में भारत के शाकाहारी और धार्मिक लोगों की भावनाएं आहत होगी।

मानकों का समर्पण:
भारत 6 महीने के भीतर अमेरिकी मानकों (Standards) को स्वीकार करने पर विचार करेगा। इससे भारतीय मानकों की गुणवत्ता और संप्रभुता पर समझौता हो सकता है।
पारदर्शिता का अभाव: डील की शर्तों को पूरी तरह सार्वजनिक न करना ‘ट्रैप डील’ की आशंका को जन्म देता है, जिससे किसानों में अनिश्चितता और भय का माहौल बना रहेगा।
सांसद श्री सिंह ने आशंका जाहिर की है कि यदि कपास और दालों की तरह भारत अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी आयात पर निर्भर हो गया, तो हम ‘शिप-टू-माउथ’ (Ship-to-Mouth) वाली पुरानी असुरक्षित स्थिति में वापस जा सकते हैं।

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