साधना और सेवा के मौन साधक हैं चंद्रहास

स्वामी कृष्ण प्रेमानंद गिरी –

किसी धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक कार्य का दायित्व अगर चंद्रहास शुक्ल ने लिया है तो विश्वास कीजिए वह कार्य पूरी गरिमा, भव्यता , लोकप्रियता के साथ पूर्ण होगा। 

यह बात मैं किसी अनुमान के आधार पर नहीं बल्कि पिछले लगभग 50 साल से चंद्रहास को जानने, समझने के बाद दावे से कह सकता हूं। 

मैं यह मानता हूं कि चंद्रहास “साधना और सेवा” के मौन साधक हैं ।

इनकी गुरुभक्ति और सहनशक्ति अद्भुत है। चंद्रहास की छवि सबने अपने अपने अनुभव से मनचाही गढ़ी है लेकिन वे बहती नदी की तरह सर सर करते, सबकी नजरों से बहते चले जाते है – अविरल और अविराम।

बरसों पहले जब चन्द्रहास से मेरा परिचय हुआ तो धीरे – धीरे आत्मीयता बढ़ती गई। हमारी सौजन्य भेंट का असर यह हुआ कि चंद्रहास के व्यक्तित्व में निखार आया। धीरे धीरे उनके स्वभाव में उग्रता का स्थान गंभीरता ने ले लिया। पुराने लोग जानते हैं कि एक समय में अपने कार्य, व्यवहार, आलेख के माध्यम से चंद्रहास हिन्दू – हिन्दी – हिन्दुस्थान के लिए लड़ने – भिड़ने को तैयार रहते थे। धीरे धीरे उनके स्वभाव में बदलाव आया। 

उन्होंने साहित्य सृजन के माध्यम से समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए यथासंभव कार्य किया।

 वे यह कार्य आज भी अविराम कर रहे हैं। चंद्रहास धर्मपथ के अविराम पथिक हैं जो निस्वार्थ भाव से समाज हित में सक्रिय रहते हैं। 

चंद्रहास जितने गंभीर हैं उतने ही कुशल प्रबंधक भी हैं। उनको कोई दायित्व दिया जाए तो वे प्राणपण के साथ उसे सफलतापूर्वक पूरा करके ही विश्राम करते हैं। 

उन्होंने बिना की श्रेय की इच्छा के धर्म समाज के लिए जो काम किए उसका साक्षी केवल ईश्वर ही है क्योंकि अपने काम को प्रचारित करना चंद्रहास के स्वभाव में नहीं है। वे उदारता, संवेदना, परिश्रम जैसे गुणों का समुच्चय हैं। ऐसे सच्चे और अच्छे साथी को पाकर हम सब गौरवान्वित हैं। नमो नारायण को प्रणाम करते हुए अपने सहयोगी चंद्रहास के 75 वें जन्मदिन के अवसर पर हम सब उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं। 

( लेखक स्वामी कृष्ण प्रेमानंद गिरी क्रियायोग के गुरु और ज्योतिष के आचार्य हैं , संपर्क : +91 94253 02914 )

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