“वर्तमान समय में पत्रकारिता का लोकधर्म ” विषय पर विषय विशेषज्ञों ने 11 अप्रैल 2026 को चर्चा और चिंतन किया। इस आयोजन में बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी शामिल हुए।
यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश के सागर शहर में स्थित डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के रंगनाथन सभागार में हुआ। शनिवार के अवकाश के बावजूद भी विश्वविद्यालय के रंगनाथन सभागार में सुनने वालों की उपस्थिति और विषय के प्रति रुचि ऐसी थी कि कई लोगों ने खड़े रहकर इस कार्यक्रम को देखा एवं सुना।
पत्रकारिता के लोकधर्म जैसे विषय पर मुख्यतः प्रख्यात समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर और पद्म भूषण एवं पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने अपना वक्तव्य दिया।


अपने वक्तव्य में पत्रकारिता पर विचार साझा करते हुए चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि, आज की पत्रकारिता के पीछे काॅरपोरेट खड़ा है, जो पत्रकारों पर नेतृत्व थोप रहा है। मीडिया का जो रोल है वह आज राजनीति की सुपाड़ी बन चुका है। मीडिया ने जिस तरह कुछ लोगों का प्रचार किया उससे कुछ लोग ही चमक रहे हैं। पत्रकारिता आज अराजक हो गई है जबकि, पत्रकारिता का धर्म तो लोगों के साथ जुड़ना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि, पत्रकारिता का आदर्श महात्मा गांधी हैं। उनकी पत्रकारिता, लोकतांत्रिक पत्रकारिता थी। उनकी पत्रकारिता की भाषा भी आमजन की भाषा थी। आज पत्रकारिता मर रही है। गुलाम हो रही है।
श्री ठाकुर ने अपने धाराप्रवाह वक्तव्य में पत्रकारों की सुरक्षा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के लिए कोई प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था नहीं है? अधिकारी कई बार दुर्भावनावश उनके विरुद्ध कार्यवाही करते हैं।
श्री ठाकुर ने कहा कि पत्रकार भी एक इंसान हैं। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज को भी उठानी चाहिए।
श्री ठाकुर ने कहा कि आज पत्रकारिता के धर्म को जिंदा रखने के लिए क्या हम कुछ ऐसे लोगों को तैयार कर सकते हैं जो कुछ पैसा पत्रकारिता को मजबूत करने में लगायें ? यह गंभीर सवाल बना हुआ है।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास को याद किया।उन्होंने कहा कि, भारत में पत्रकारिता का इतिहास 250 वर्ष का है। इसमें हिंदी पत्रकारिता का काल 200 वर्ष का है।
उन्होंने आगे कहा कि हिंदी पत्रकारिता को जब 100 वर्ष हुए तब हिंदी पत्रकारिता को मालूम नहीं था कि, हमारा जन्म कब हुआ। इसके बाद जो खोज की गई उससे पता चला उदंत मार्तण्ड से हिंदी पत्रकारिता शुरू हुई।
अपने संबोधन में श्री राय ने कहा कि आज के समय की सबसे बड़ी चुनौतियों से टकराना ही पत्रकारिता का लोकधर्म है। पत्रकारों के बारे में आज बहुत अच्छी राय नहीं है। चाहे आप स्वतंत्र पत्रकार हो या किसी बड़े मीडिया हाउस में कार्यरत पत्रकार हो। आजादी के प्रकल्प में वास्तविक रूप में हमें पत्रकारिता देखने मिली। तब के समय की पत्रकारिता स्वतंत्रता के लक्ष्य से प्रेरित थी। वर्ष 1990 के बाद भारतीय पत्रकारिता एक भंवर में फंस गई है। इसे पार करना आसान नहीं है। आज मीडिया में एकाधिकार हाऊस बन रहे हैं। इसके कारण पत्रकारिता और पत्रकारों पर संकट खड़ा हो चुका है।

इस अवसर पर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉक्टर विवेक जायसवाल ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि, सागर विश्वविद्यालय का पत्रकारिता विभाग मध्य भारत की पत्रकारिता का बड़ा केन्द्र रहा है। पत्रकारिता विभाग अब नये संसाधन के साथ काम कर रहा है।
श्री जायसवाल ने कहा कि पत्रकारिता का लोकधर्म आज कितना बचा है? लोकधर्म का कितना पालन हो रहा है? यह सवाल आज के तकनीकी युग की बड़ी चुनौती है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के नाते इसका लोकधर्म बचा रहे यह जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज अपने पेशे के साथ कितना न्याय कर पा रही है इस पर लगातार विमर्श होना चाहिए।
कार्यक्रम में पत्रकारिता विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉक्टर अलीम अहमद खान ने कहा किपत्रकारिता के हालात कभी अच्छे रहे ही नहीं। हमें इन्हीं हालात में रास्ता बनाना पड़ता है। जो अच्छी पत्रकारिता करना चाहते हैं वे रास्ता बना लेते हैं।
डॉक्टर अलीम ने कहा कि पत्रकारों ने समय-समय पर कई घोटालों को उजागर कर अपनी साहसी पत्रकारिता का परिचय दिया है। अभी इतना अंधेरा नहीं है कि पत्रकारिता को जिंदा ना रखा जा सके। जो लोग पत्रकारिता करना चाहते हैं वह खुद अपना उजाला तलाश लेते हैं।
उन्होंने कहा कि हमारे विद्यार्थी पत्रकारिता में अपना परचम लहराते आ रहे हैं। विद्यार्थियों ने सागर शहर के मुद्दों से लेकर भोपाल और अन्य गांव, शहरों की रिपोर्टिंग की है। अपनी रिपोर्टिंग से विद्यार्थी कई खुलासे कर रहे हैं जो सराहनीय है।
वर्तमान में पत्रकारिता के लोकधर्म विषय पर आधारित इस आयोजन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर यशवंत सिंह ठाकुर, पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कालीनाथ झा, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, शिक्षक और समाजसेवी जयंत सिंह तोमर, लेखिका शिवा श्रीवास्तव, पत्रकार दिनेश शुक्ला, समाजिक कार्यकर्ता धर्मेन्द्र लटोरिया भी उपस्थिति रहे।
यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के विभिन्न शिक्षकों, पदाधिकारियों, कर्मचारियों और पत्रकारिता सहित अन्य विभागों के विद्यार्थियों के सहयोग से सफल हुआ।
– सतीश भारतीय





