अमिताभ पाण्डेय
भोपाल।
भारतीय संविधान में पिछड़े, कमजोर वर्गों के संरक्षण और सशक्तिकरण के लिए जो विशेष प्रावधान बनाए गए हैं, उनका लाभ लक्षित वर्ग को मिले, यह मंशा सरकार और समाज सभी की है।
परेशानी तब शुरू होती है जब पिछड़े- कमजोर वर्गों से जुड़े लोग अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति नहीं होने या किसी के दबाव, भेदभाव में आकर झूठी शिकायतें करते हैं।
इन शिकायतों के कारण पुलिस, प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था सभी को अपना काम करना पड़ता है।
शिकायतों की जांच और उनके निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रक्रिया कई बार इतनी लंबी हो जाती है जिन पर आरोप लगे हैं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान होता है।
जिस पर आरोप लगे हैं उसे अपमान, अपेक्षा और उपहास का पात्र बनना पड़ता है।
अब समय आ गया है कि झूठी शिकायतें करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
झूठी शिकायतें दर्ज करने पर पुलिस से भी जवाब तलब किया जाए कि आखिर उन्होंने बिना विवेचना, अनुसंधान को पूरा किए प्रकरण कैसे दर्ज कर लिया ?
यदि झूठी शिकायत करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो इससे लोगों की प्रतिष्ठा को बहुत नुकसान होगा और लगातार हो भी रहा है।
ऐसे मामलों में पुलिस से लेकर न्यायालय तक से यह उम्मीद की जाती है कि झूठे मामलों को रोकने के लिए कठोर कार्रवाई की जाए।
हाल ही में नागपुर की एक अदालत ने भी अपने फैसले में उन आरोपों को झूठा साबित कर दिया। ये आरोप एक शिकायत के माध्यम से शिक्षा संस्थान में निदेशक जैसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पद पर बैठे व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए थे। इस संबंध में पुलिस ने एस सी एस टी एक्ट के अन्तर्गत जो प्रकरण दर्ज किया वह न्यायालय में झूठा साबित हुआ।
यह प्रकरण भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पश्चिमी क्षेत्र, अमरावती से संबंधित है। इसमें तत्कालीन निदेशक के विरुद्ध शिकायत करते हुए आरोप लगाए गए थे।
अदालत के गलियारों में लगभग 4 साल तक चले इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने 24 फरवरी 2026 को निर्णय सुनाया ।
इस निर्णय में संस्थान के तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार सौमित्र के खिलाफ दर्ज SC/ST अत्याचार अधिनियम के मामले को निरस्त कर दिया है।
न्यायमूर्ति प्रवीन एस. पाटिल ने 24 फरवरी 2026 को जारी आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अत्याचार अधिनियम की धाराएं लागू नहीं होतीं और कार्यवाही जारी रखना “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।
उल्लेखनीय है कि यह मामला वर्ष 2022 में तब सुर्खियों में आया था जब संस्थान के एक संविदा सहायक प्राध्यापक की शिकायत पर फ्रेजरपुरा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि डॉ. सौमित्र ने जातिसूचक व्यवहार करते हुए अपमानित किया और मानसिक प्रताड़ना दी ।
इसके आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r), 3(1)(m) और 3(1)(p) के तहत मामला दर्ज हुआ और बाद में आरोप-पत्र दाखिल किया गया।
यहां यह बताना जरूरी है कि इस संस्थान में कार्यरत एक संविदा सहायक प्राध्यापक ने आरोप लगाया था कि 7 एवं 8 दिसंबर 2021 को उन्हें कक्षा रोकने को कहा गया और स्टाफ मीटिंग के दौरान अपमानित किया गया ।
आरोप था कि दिसंबर 2021 में कक्षा के दौरान फोन पर निर्देश देकर उन्हें छात्रों के सामने रोका गया तथा एक बैठक में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया। शिकायतकर्ता का कहना था कि यह व्यवहार उनकी अनुसूचित जाति पहचान के कारण किया गया।
दूसरी ओर, डॉ. सौमित्र ने अदालत में दलील दी कि यह पूरा विवाद प्रशासनिक अनुशासन से जुड़ा था। उनके अनुसार, संबंधित प्राध्यापक के कार्य निष्पादन और आचरण को लेकर संस्थागत स्तर पर संवाद और नोटिस की प्रक्रिया अपनाई गई थी। 13 जनवरी 2022 को उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। बचाव पक्ष का तर्क था कि किसी भी स्तर पर जातिसूचक टिप्पणी नहीं की गई और आरोप निजी द्वेष के तहत लगाए गए।
इस संबंध में न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयान में कहीं भी प्रत्यक्ष रूप से जातिसूचक टिप्पणी या अपमान का उल्लेख नहीं है।
संस्थान द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में भी यह दर्ज है कि प्रारंभिक बैठक में शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया था कि कोई प्रत्यक्ष जाति-आधारित टिप्पणी नहीं की गई।

प्रशासनिक स्तर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई या कार्य-संबंधी कठोरता को स्वतः जातीय उत्पीड़न नहीं माना जा सकता, जब तक कि अपमान स्पष्ट रूप से जाति के आधार पर न किया गया हो।
इस संबंध में न्यायालय ने हाल में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा दिए गए निर्णय (केशव महतो बनाम बिहार राज्य, जनवरी 2026) का हवाला देते हुए कहा कि एट्रोसिटी एक्ट के तहत अपराध सिद्ध होने के लिए अपमान या धमकी स्पष्ट रूप से जाति के आधार पर और सार्वजनिक दृष्टि में होना आवश्यक है ।
न्यायालय ने कहा कि एट्रोसिटी एक्ट वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए एक सशक्त कानून है, किन्तु इसका दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। यदि विवाद प्रशासनिक या व्यक्तिगत मतभेद से उत्पन्न हो और उसमें जातीय अपमान के ठोस प्रमाण न हों, तो न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए । अदालत ने यह भी माना कि किसी संस्थान प्रमुख द्वारा कार्य-प्रदर्शन में सुधार हेतु दिए गए निर्देश या अनुशासनात्मक कदम को आपराधिक मंशा से नहीं जोड़ा जा सकता, जब तक स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध न हों।
पूर्व में प्रकाशित समाचारों में इस प्रकरण को शैक्षणिक संस्थान में प्रशासनिक विवाद के रूप में देखा गया था, जहाँ कार्य-प्रदर्शन, अनुशासन और संवादहीनता ने स्थिति को कानूनी विवाद में बदल दिया। अदालत के निर्णय के बाद यह मामला न केवल संबंधित पक्षों के लिए बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक निर्णयों और एट्रोसिटी कानून के अनुप्रयोग की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
अब सवाल यह है कि झूठे आरोप लगाने वाले पर क्या कार्यवाही होगी ?
कौन कार्यवाही करेगा और यह कार्यवाही कब तक होगी ?
झूठी शिकायतें प्रशासन , पुलिस, न्यायालय का समय कब तक बर्बाद करती रहेंगी ?
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं संपर्क : 9424466269 )





