तेज रफतार वाहन , खराब सड़कें , टक्कर मारकर भाग जाने वालों को पकड़ने में पुलिस की विफलता , पकडे जाने पर लम्बी अदालत की प्रक्रिया के बावजूद आरोपियों का बरी हो जाना ऐसे प्रमुख कारण हैं जिससे सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। इनको रोकने के लिए अभी जो प्रयास किए जा रहे हैं उनको अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है।
इस संबंध में नागरिक यह जानना चाहते हैं कि दुर्घटना रोकने के लिए शासन की ओर से क्या प्रयास किए जा रहे हैं ?
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के भिंड जिला मुख्यालय पर आयोजित पत्रकार वार्ता में बढ़ती सड़क दुर्घटना को रोकने के लिए संबंधित सवाल मंत्री को पसंद नहीं आए।
वे इसका संतोषप्रद जवाब देने के बजाय पत्रकारों पर नाराज़ हो गए ।
केंद्रीय बजट 2026-27 की उपलब्धियाँ गिनाने पहुँचे मध्यप्रदेश सरकार के कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना से जब पत्रकारों ने नेशनल हाईवे-719 (भिंड–ग्वालियर) के उन्नयन पर सवाल पूछा, तो जवाब देने के बजाय उन्होंने मीडिया पर ही ‘नकारात्मकता’ का आरोप लगा दिया।
सवाल यह है कि क्या सड़क हादसों पर सवाल पूछना नकारात्मकता है ?
इसे रोकने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों की क्या ज़िम्मेदारी है?
इस बारे में देश के आँकड़े क्या कहते हैं?
उल्लेखनीय है कि भारत में हर साल लगभग 1.6 से 1.7 लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है, यानी प्रतिदिन औसतन 400 से अधिक मौतें यानी हर दिन एक छोटे गाँव जितनी आबादी सड़क पर ख़त्म हो जाती है।
हज़ारों लोग स्थायी रूप से अपंग हो जाते हैं।
देश को इसका आर्थिक नुक़सान अरबों रुपयों में होता है, लेकिन किसी को परवाह नहीं है। सबसे दुखद बात यह है कि इन मौतों में बड़ी संख्या 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की होती है, जो देश की कार्यशील, उत्पादक आबादी है।
पाठकों को बता दें कि लगभग दस साल पहले, भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह वादा किया था कि सड़क हादसों और मौतों को कम किया जाएगा। 2015 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के ‘सड़क सुरक्षा के लिए कार्रवाई का दशक’ अभियान का समर्थन किया था। 2020 के बाद, वैश्विक लक्ष्य के तहत 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों को 50% तक घटाने का संकल्प दोहराया गया।
लेकिन सवाल है ,क्या हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं?
सरकारी रिपोर्टें खु़द बताती हैं कि कुल मौतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी नहीं आई। कई वर्षों में तो संख्या और बढ़ी है। अगर लक्ष्य आधी मौतें कम करने का था,
तो आज स्थिति क्या कहती है?
‘खूनी हाईवे’ सिर्फ़ भिंड की कहानी नहीं :
मध्यप्रदेश में भिंड-ग्वालियर सड़क मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग है।
देश के लगभग हर राज्य में ऐसी सड़कें हैं, जिन्हें लोग अपने अनुभव से नाम दे चुके हैं — कहीं ‘डेथ कॉरिडोर’,
कहीं ’ब्लैक स्पॉट’, कहीं ‘खू़नी मोड़’।
हर हादसे के बाद शोक, मुआवज़ा, बयान… फिर सब सामान्य। असली सवाल क्या हैं? क्या सड़क सुरक्षा बजट में प्राथमिकता है? क्या ब्लैक स्पॉट सुधारने की प्रक्रिया समय पर पूरी होती है? क्या इंजीनियरिंग, एनफोर्समेंट और इमरजेंसी रिस्पॉन्स — तीनों साथ काम कर रहे हैं? क्या डेटा पारदर्शी है और उस पर कार्रवाई हो रही है?
सवाल पूछना देशविरोध नहीं है। जब पत्रकार पूछते हैं कि बजट में इस हाईवे का ज़िक्र क्यों नहीं है, तो यह सरकार की उपलब्धियों को नकारना नहीं, बल्कि जनता की जान की क़ीमत पूछना है।
लोकतंत्र में सवाल दुश्मनी नहीं होते।
वे सुधार की शुरुआत होते हैं।
अगर हम वैश्विक मंच पर वादा करते हैं कि मौतें आधी करेंगे, तो जनता को हक़ है पूछने का कि उस वादे का क्या हुआ?
सड़क पर गिरा खू़न किसी पार्टी का नहीं होता,
वह किसी के परिवार का होता है।
किसी माँ का बेटा, किसी बच्चे का पिता, किसी बहन का भाई या उसका सुहाग।
सवाल जारी रहेंगे, क्योंकि सड़क सुरक्षा राजनीति से बड़ी है।







