लेसर नोन स्पीशीज पर सेमिनार, वन्यजीव संरक्षण पर हुई चर्चा

भोपाल ।

 मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित पर्यावरण परिसर एप्को में वन्य जीव संरक्षण के विषय में सेमिनार आयोजित किया गया।

इसमें सेंट्रल इंडिया की भूमि और जल में पाई जाने वाली लेसर नोन स्पीशीज पर चर्चा की गई। सेमिनार का उद्घाटन 16 जनवरी 2026 को मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षण और वन बल प्रमुख वीएन अम्बाड़े, चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन, मध्य प्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अजय यादव एवं भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ के रविचंद्रन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। उद्घाटन सत्र में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के पूर्व प्रोफेसर बीसी चौधरी उपस्थित थे।

मध्य प्रदेश के वन्यजीव प्रबंधन की उपलब्धियां

अपना वक्तव्य देते हुए वीएन अम्बाड़े ने कहा कि मध्य प्रदेश वन्यजीवों के प्रबंधन में उत्कृष्ट रहा है और बीते सालों में यहां कई कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। 

उन्होंने सेमिनार के विषय पर अपने विचार रखते हुए बताया कि लेसर नोन (कम ज्ञात) में न केवल पशुवर्ग (Fauna) पर बात होनी चाहिए, बल्कि इसके साथ ही फ्लोरा पर भी चर्चा आवश्यक है।

 उन्होंने विकास कार्यों के दौरान घोंसले युक्त पेड़ों को हटाने में संबंधित पक्षी को नुकसान न हो, इसके लिए डीसीएफ़ की निगरानी में ही पेड़ काटने या हटाने पर जोर दिया।

 इसके अतिरिक्त उन्होंने गोडावण को लेकर भी अपने प्रशासनिक अनुभव साझा किए।

लेसर फ्लोरिकन और कैरेकल संरक्षण पर विशेष पहल

चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने आयोजक संस्था सोसाइटी ऑफ नेचर हीलर्स, कंजर्वेटर एंड लोकल टूरिज्म डेवलपमेंट (एसएनएचसी) को वन्य जीव संरक्षण की चर्चा मध्य प्रदेश से सेंट्रल इंडियन लैंडस्केप तक विस्तारित करने के लिए बधाई दी।

 उन्होंने कहा कि लेसर फ्लोरिकन और गोडावण का गायब होना दुखद है।

 पिछले मानसून में लेसर फ्लोरिकन पर किए गए सर्वे के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं थे। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में स्याहगोश (Caracal) को लेकर उत्कृष्ट कार्य हो रहा है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश वन विभाग जल्द ही गांधी सागर अभ्यारण्य में स्याहगोश पर आधारित विशेष प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। उन्होंने घड़ियालों की नेस्टिंग साइट को संरक्षित करने, महाशीर, विभिन्न पक्षियों और तितलियों के संरक्षण के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।

मध्य प्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अजय यादव ने कहा कि यह जानना आवश्यक है कि लेसर नोन क्षेत्रों में क्या चल रहा है। मध्य प्रदेश में कई प्रजातियां हैं जो संकटग्रस्त हैं।

 उन्होंने बताया कि बहुत सी प्रजातियों के बारे में यह पता नहीं है कि उनकी वर्तमान स्थिति क्या है, उनके आवास को क्या खतरा है? 

इस ज्ञान के अंतर को पूरा करने में यह कॉन्फ्रेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

घड़ियाल संरक्षण के 50 वर्ष पूर्ण

सम्मेलन के पहले तकनीकी सत्र में भारत के क्रोकोडाइल संरक्षण प्रोजेक्ट के 50 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। 

इस सत्र को बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर आरजे राव द्वारा संचालित किया गया। 

प्रख्यात वन्यजीव जीवविज्ञानी बीसी चौधरी ने मगरमच्छों की तुलना जीवित जीवाश्म से करते हुए 1 जुलाई 1975 को मगरमच्छ संरक्षण कार्यक्रम शुरू होने से लेकर अब तक की यात्रा के अनुभव साझा किए। 

उन्होंने बताया कि 1969 में IUCN की कॉन्फ्रेंस में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने मगरमच्छों पर एक महत्वपूर्ण पेपर प्रस्तुत किया था, जिसके बाद इस दिशा में गंभीर शोध शुरू हुआ। 

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य एक आदर्श मॉडल है जिसे अन्य राज्यों को विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए अपनाना चाहिए।

पैनल चर्चा में तरुण नायर ने चुनौतियों पर बात करते हुए कहा कि मानव-प्रधान क्षेत्रों में आवास की समस्या गंभीर है और केवल संख्या ही कहानी नहीं है, बल्कि गहन शोध कार्य भी महत्वपूर्ण है। मोबाइल तकनीक के माध्यम से मछुआरा समुदाय में आए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का उपयोग संरक्षण के लिए करना होगा।

  सुहास कुमार ने बताया कि उन्होंने 2008 में वन्यजीव प्रभाग बनाने का प्रस्ताव दिया था।

ऋषिकेश शर्मा ने चंबल में दीर्घकालिक निगरानी के परिणाम साझा करते हुए बताया कि वर्तमान में यहां 2462 घड़ियाल हैं और कई दुर्लभ प्रजातियों के कछुए भी पाए जाते हैं। 

वन विभाग में रहे आर श्रीनिवास मूर्ति ने अपनी मुरैना में पोस्टिंग के दौरान के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने चंबल के लिए एक व्यापक प्रबंधन योजना तैयार की थी। 

उन्होंने बताया कि चंबल में गंगा डॉल्फिन की भी अच्छी संख्या है और इस पूरे क्षेत्र को समग्र रूप से देखने की आवश्यकता है।

वन विभाग के अधिकारी शुभरंजन सेन ने बताया कि नमामि गंगे परियोजना के तहत चंबल में व्यापक शोध और निगरानी कार्य हो रहा है। त्रिराज्यीय निगम बनाने की कोशिश की जा रही है और अगले महीने से नया सर्वेक्षण शुरू होगा। 

उन्होंने कहा कि खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों से घड़ियालों के घोंसलों की रक्षा करना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

कार्यक्रम में वन विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी आर श्रीनिवास मूर्ति द्वारा तैयार की गई पहली सिटीजन साइंस रिपोर्ट का विधिवत लोकार्पण भी किया गया।

कच्छ में छोटे मांसाहारी जीवों पर महत्वपूर्ण अध्ययन

तकनीकी सत्रों में भारतीय वन्यजीव संस्थान की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ शोमिता मुखर्जी ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र में छोटे आकार के मांसाहारी जीवों पर अपना विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि नवंबर 2023 से मार्च 2024 तक 67 स्थानों पर इंफ्रारेड कैमरा ट्रैप लगाकर पांच व्यापक सर्वेक्षण किए गए। उनकी फील्ड स्टडी में सबसे अधिक गोल्डन जैकल दिखे, जबकि जंगली बिल्ली, अफ्रो-एशियाटिक वाइल्ड कैट और इंडियन ग्रे मंगूज की महत्वपूर्ण उपस्थिति भी दर्ज की गई। 

उन्होंने कहा कि भारत में 75 फीसदी जंगली बिल्लियां बची हैं और दक्षिण एशिया इनका प्रमुख गढ़ है, इसलिए इन्हें पहचानना और बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

 कैरेकल भारत में स्वाभाविक रूप से दुर्लभ है क्योंकि यहां उसका उपयुक्त प्राकृतिक आवास सीमित है, और खराब भूमि नीति इसके लिए बड़ा खतरा है।

 पांच कैट प्रजातियों सहित अन्य कार्निवोर वेस्टलैंड में मौजूद हैं, इसलिए नीतिगत स्तर पर वेस्टलैंड के संरक्षण को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण में समुदाय की भागीदारी

डॉ सुमित डूकिया ने पश्चिमी राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) के संरक्षण के लिए स्थानीय युवा नेटवर्क बनाने पर अपना शोध प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों को प्रोत्साहित करना अत्यंत आवश्यक है, तभी वे निगरानी कार्यों में सहयोग करेंगे। उन्होंने बताया कि जहां जीआईबी दिखता है वहां वन विभाग की फेंसिंग हो जाती है, जिससे किसान इसके खिलाफ हो जाते हैं। आवश्यकता है कि स्थानीय लोगों के साथ मिलकर इनके आवास को संरक्षित किया जाए। 

उन्होंने रेखांकित किया कि अधिकांश जीआईबी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हैं, इसलिए स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और उन्हें विश्वास दिलाना महत्वपूर्ण है।

 बीकानेर में कृषि लाभदायक नहीं होने के कारण किसान अपनी भूमि खाली छोड़ देते हैं, जहां जीआईबी का आवास पुनर्स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने धर्म, लैंडस्केप और संस्कृति के साथ जुड़कर समुदाय को संरक्षण से जोड़ने पर जोर दिया।

हिल मैना से लेकर जुगनू पर भी प्रस्तुति :

डॉ राजत भार्गव ने हिल मैना पर अपना शोध साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने अपना काम शुरू किया था तब यह प्रजाति लगभग विलुप्त हो चुकी थी, लेकिन अब जंगल में 200-300 पक्षी हैं। उन्होंने कहा कि यदि आप आवास पर काम करते हैं तो पक्षी वापस आ जाते हैं।

 वैश्विक पालतू पशु व्यापार इस प्रजाति के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

 डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्रा ने मध्य भारत के जंगली भैंसों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में 50 से कम जंगली भैंसे बचे हैं, जबकि उत्तर-पूर्व में लगभग 4000 हैं। 

उन्होंने 2007 में गठित वाइल्ड बफैलो टास्क फोर्स के कार्यों और शिकार, आवास क्षति तथा जल की कमी जैसी चुनौतियों का विस्तार से उल्लेख किया।

सत्र की अध्यक्षता असद रहमानी ने की और उन्होंने कहा कि घासभूमि में रहने वाले जीव सबसे अधिक खतरे में हैं। 

उन्होंने सभी प्रजातियों को सम्मान देने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि गौर को इसलिए पुनः स्थापित करना चाहिए क्योंकि वह गौर है, न कि केवल इसलिए कि वह बाघ या चीते का शिकार है।

इसके अतिरिक्त दिन की अंतिम प्रस्तुति के रूप में देहरादून के ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ निधि राणा ने जुगनू पर अपनी प्रस्तुति दी। इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक और विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ वीवी उनियाल द्वारा की गई। सुश्री राणा ने बताया कि भारत में जुगनुओं पर पहले राष्ट्रीय दस्तावेज़ीकरण और पश्चिमी हिमालय के जुगनुओं पर शोध से पता चलता है कि ये कोमल शरीर वाले भृंग (बीटल) महत्वपूर्ण जैव नियंत्रण एजेंट हैं और पर्यावरण के संवेदनशील जैव संकेतक हैं, विशेष रूप से प्रकाश प्रदूषण के प्रति। दुर्भाग्यवश, इनकी आबादी के बारे में डेटा अभी भी सीमित है और ये मानवजनित दबावों जैसे आवास विखंडन, कीटनाशकों और प्रकाश प्रदूषण से गंभीर रूप से प्रभावित हैं। 

वर्तमान में जियो-लिंक सबमिशन के माध्यम से सर्वेक्षण किए जा रहे हैं, जो इन महत्वपूर्ण कीटों के संरक्षण के लिए आवश्यक जानकारी एकत्र करने में मदद कर रहे हैं।

यह सम्मेलन सोसाइटी ऑफ नेचर हीलर्स, कंजर्वेटर एंड लोकल टूरिज्म डेवलपमेंट (एसएनएचसी) द्वारा आयोजित किया गया है और इसमें देशभर के प्रमुख वन्यजीव विशेषज्ञ, शोधकर्ता और संरक्षणवादी शामिल हो रहे हैं। 

यह तीन दिवसीय आयोजन है। कार्यक्रम के दूसरे दिन नदियों के इकोसिस्टम को ठीक करने और हेल्दी एनवायरनमेंट बनाए रखने में लोकल कम्युनिटी की ज़रूरी भूमिका पर चर्चाएं आयोजित की जाएंगी।

( यह समाचार पर्यावरण प्रेमी पत्रकार शिशिर अग्रवाल की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया । )

– अमिताभ पाण्डेय

Editor

I am a journalist having over 25 years of experience in journalism. Having worked for several national dailies and as correspondent in All India Radio, I am currently working as a freelancer.

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