नई दिल्ली, 27 जनवरी।
सरकार द्वारा आगामी 1 फरवरी 2026 को केंद्रीय बजट पेश किया जाएगा। बजट की तैयारी लगभग पूरी हो गई है।
इसी बीच, विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने भारत की वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के कुछ तत्वों में सुधार करने का अनुरोध केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से किया है।
हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखे में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि “हमारा मानना है कि भारत ऊर्जा, उद्योग, अपशिष्ट प्रबंधन, परिवहन और कृषि जैसे क्षेत्रों में सरकारी नीतियों के माध्यम से हरित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है।
हमारा मानना है कि जीएसटी और राजकोषीय संरचनाएँ इस हरित अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।”

उल्लेखनीय है कि बजट की तैयारी के बीच CSE ने ‘ टैक्स में छूट’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें एक गंभीर विसंगति को उजागर किया गया है।
वित्त मंत्री को लिखे CSE के पत्र में कहा गया है कि :
“वर्तमान में, हमारी कर प्रणाली पुनर्चक्रित सामग्रियों को नई सामग्रियों के समान मानती है, जिससे उन क्षेत्रों को प्रभावी रूप से दंडित किया जा रहा है जो चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर हमारे परिवर्तन को गति प्रदान कर सकते हैं।”
सीएसई के औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम निदेशक निवित के यादव बताते हैं :
“अपने विश्लेषण में हमने धातु स्क्रैप, प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, बैटरी कचरा, कागज, कांच, टायर और पुराने वाहनों सहित 12 प्रमुख अपशिष्ट और पुनर्चक्रण क्षेत्रों का अध्ययन किया है। प्रत्येक क्षेत्र में पुन: उपयोग की अपार संभावनाएं हैं; साथ ही सामग्री की दक्षता को अनुकूलित करने और अपशिष्ट एवं प्रदूषण को कम करने की भी भरपूर क्षमता है।”
इस रिपोर्ट में पाया गया है कि पुनर्चक्रण योग्य कचरे पर मौजूदा जीएसटी संरचना के कारण दोहरा नुकसान हो रहा है, जिससे लेन-देन का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक चैनलों की ओर जा रहा है और साथ ही पुनर्चक्रण, संसाधन सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है।
अध्ययन से पता चलता है कि पुनर्चक्रण योग्य कचरे पर जीएसटी को घटाकर 5 प्रतिशत या शून्य करने और अनौपचारिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के एकीकरण के साथ, इस संरचनात्मक नुकसान को आंशिक एकीकरण के साथ लगभग ₹34,000 करोड़ और पूर्ण एकीकरण के साथ ₹90,000 करोड़ से अधिक के वार्षिक शुद्ध राजकोषीय लाभ में परिवर्तित किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, यह कदम लघु एवं मध्यम उद्यमों को मजबूत कर सकता है, लाखों अनौपचारिक श्रमिकों की आजीविका में सुधार कर सकता है, कच्चे माल के आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है और राजकोषीय नीति को देश की चक्रीय अर्थव्यवस्था और औद्योगिक प्राथमिकताओं के अनुरूप बना सकता है।
सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम के प्रबंधक पार्थ कुमार कहते हैं, “खनन और लौह एवं इस्पात क्षेत्रों के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने के उपायों पर एक अन्य रिपोर्ट में हमने पाया है कि अपशिष्ट पदार्थों का पुन: उपयोग – सीमेंट के मामले में स्लैग, फ्लाई ऐश या नगरपालिका अपशिष्ट, और लौह एवं इस्पात के मामले में स्टील स्क्रैप – अपशिष्ट कम करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। हालांकि, पुनर्चक्रित और कम कार्बन वाले पदार्थों पर वर्तमान में लागू 18 प्रतिशत जीएसटी एक बड़ा अवरोध है।”
इस संबंध में पर्यावरण की प्रमुख पैरोकार सुनीता नारायण बताती हैं कि “जीएसटी दरों में यह कमी हरित उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक प्रोत्साहन साबित हो सकती है”। उदाहरण के लिए, सीमेंट क्षेत्र में, भारत वर्तमान में कई प्रकार के सीमेंट का उत्पादन करता है, जिनमें CO₂ उत्सर्जन की मात्रा अलग-अलग होती है, जिनमें से ओपीसी सबसे अधिक उत्सर्जन वाला सीमेंट है; अन्य प्रकारों में उत्सर्जन की तीव्रता कम होती है क्योंकि उनके उत्पादन प्रक्रियाओं में कच्चे माल के रूप में अपशिष्ट का उपयोग किया जाता है।

वे मानती हैं कि “जीएसटी उत्सर्जन तीव्रता के आधार पर विभिन्न प्रकार के सीमेंट में अंतर नहीं करता है, इसलिए उद्योगों और उपभोक्ताओं के लिए हरित उत्पादन और उपभोग की ओर बढ़ने का कोई प्रोत्साहन नहीं है।”
भारत में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर अपनी रिपोर्ट ‘सीमेंट सेक्टर’ में सीएसई ने एक विकल्प सुझाया है जिसके तहत कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन वाले सीमेंट जैसे पीपीसी, पीएससी, सीसी और एलसी3 (जैसा कि सरकार द्वारा कच्चे माल के प्रतिस्थापन के लिए उपयोग किए जाने वाले अपशिष्ट पदार्थ के प्रकार और अनुपात के आधार पर परिभाषित किया गया है) पर कम जीएसटी लगाया जा सकता है। इससे ओपीसी उत्पादन सीमित होगा और भारत में कम कार्बन उत्सर्जन वाले सीमेंट के उत्पादन और मांग को बढ़ावा मिलेगा।
वित्त मंत्री को लिखे पत्र में सुनीता नारायण ने उल्लेख किया है कि “अपशिष्ट पर कर का यह युक्तिकरण केवल राजकोषीय सुधार के बारे में नहीं है; यह इस बात को स्वीकार करने के बारे में है कि अपशिष्ट एक संसाधन है”।
सुनीता कहती हैं : “‘कर में ढील देकर’, हम हरित उद्यमों के लिए समान अवसर प्रदान कर सकते हैं, अपने संसाधन-भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं और अपने लाखों सबसे कमजोर श्रमिकों की रक्षा कर सकते हैं।”
यदि सी एस ई के सुझाव पर बजट पेश करने से पहले ध्यान दिया जाए, जरूरी सुधार कर दिए जाए तो केन्द्र सरकार का यह निर्णय बेहतर पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा ।
– अमिताभ पाण्डेय
( लेखक पर्यावरण संबंधी विषय के पत्रकार हैं – संपर्क : 9424466269 )





