नये साल में प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें हम 

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आज से नया साल शुरू हो रहा है। नववर्ष का पहला दिन संकल्प लेने का दिन होता है। अब जरूरत इस बात की प्रकृति के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया जाए। 

प्रकृति से कम लें और उसे अधिक लौटाएं। यही हम सबके जीवन का मूल मंत्र होना चाहिए। 

 उल्लेखनीय है कि हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज और यहां तक कि हमारे अस्तित्व का आधार प्रकृति ही है। हमारे जंगल, नदियां, समुद्र और मिट्टी हमें भोजन, सांस लेने की हवा और अपनी फसलों की सिंचाई के लिए पानी प्रदान करते हैं।

इन सभी प्राकृतिक संपत्तियों को अक्सर दुनिया की ‘प्राकृतिक पूंजी’ कहा जाता है। ये अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

 खेती और वानिकी से लेकर मनोरंजन और पर्यटन तक सब प्रकृति का हिस्सा हैं। विश्व की आर्थिक तरक्की ने पिछले 50 से 70 वर्षों में उत्पादन, व्यापार, और तकनीकी विकास को तेज़ किया है।

हम इस तरक्की की जो पर्यावरणीय कीमत चुका रहे हैं वह बहुत नुकसानदायक है। यह कीमत वायु, जल, मिट्टी, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में दिखाई देती है।

 वैश्विक आर्थिक वृद्धि की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो 1950 से पहले औद्योगीकरण की रफ्तार धीमी थी।

वर्ष 1950 से 2020 के बीच जीडीपी में 10 गुना वृद्धि हो गई। इसके कारण बड़े पैमाने पर जंगल कटाई, खनन की गतिविधियां बढ़ी। 

वर्ष 2020 से 2025 तक जीडीपी निरंतर बढ़ी, इसके साथ ही पर्यावरणीय संकट भी बढ़ता गया। अभी यह स्थिति बन गई है कि प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है।

 हम जंगलों को काट देते हैं, समुद्रों में ज़रूरत से ज़्यादा मछलियां पकड़ते हैं, नदियों को प्रदूषित करते हैं और आद्रभूमि पर निर्माण करते हैं।

मनुष्य अपनी सुविधाओं और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए जंगल काटता है, खनिजों का अत्यधिक दोहन करता है, नदियों को प्रदूषित करता है। यह लालच प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर रहा है। 

विकास की अंधी दौड़ में हमने उद्योग, शहरीकरण और उपभोग को इतना बढ़ा दिया कि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया, हवा, पानी, मिट्टी सब प्रदूषित हो गए। 

इस लालच के कारण ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर पिघलना, और अत्यधिक मौसम परिवर्तन जैसी आपदाएं बढ़ रही है।

 जब हम प्रकृति को केवल “संसाधन” मानते हैं, तो उसे नष्ट करना आसान लगता है। जब उसे “मां” मानते हैं, तो उसकी रक्षा स्वाभाविक हो जाती है। अगर हम अपने समाज और अर्थव्यवस्था के लिए प्रकृति के महत्व को समझना शुरू कर दें, तो हम अल्पकालिक लाभ के लिए प्रकृति को नष्ट करने के बजाय, उसके साथ सामंजस्य बिठाकर रहने के महत्व को भी समझेंगे।

प्रकृति से हमें अपनी आवश्यकतानुसार ही लेना चाहिए और उसे लौटाने का भी प्रयास करना चाहिए। 

यह संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है ताकि भावी पीढ़ियों के लिए भी संसाधन उपलब्ध रहें। 

प्रकृति हमें जीने के लिए मूलभूत चीजें देती है, जैसे पीने का पानी, सांस लेने के लिए हवा और खाने के लिए भोजन।

हमें अपनी आवश्यकताओं के लिए ही संसाधनों का उपयोग करना चाहिए। 

जैसे, केवल उतना पानी लें जितना आवश्यक हो और केवल उतनी ही लकड़ी काटें जितनी जरूरत हो।

हमें जितना संभव हो, उतना प्रकृति को वापस देना चाहिए। जैसे, अगर हम एक पेड़ काटते हैं, तो हमें उसकी जगह एक और पेड़ लगाना चाहिए।

प्रकृति से लेना और उसे लौटाना एक संतुलित प्रक्रिया है, जिसमें हमें केवल अपनी जरूरत के अनुसार ही लेना चाहिए और बदले में उसका सम्मान, संरक्षण और पुनर्स्थापन करना चाहिए।

“कम से कम लेना और ज्यादा से ज्यादा देना” सतत विकास का मूल दर्शन है, ऐसा विकास जो पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था तीनों के संतुलन से हो।

प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना कोई आधुनिक विचार नहीं है। आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से ऐसा करते आए हैं। उन्होंने धरती को रोज़मर्रा की जिंदगी से अलग नहीं किया। वे लय, ऋतुओं और चक्रों को समझते थे। उन्होंने जो ज़रूरी था, उसे लिया और पीछे पर्याप्त छोड़ गए। 

यह सिर्फ़ ज्ञान नहीं है, यह एक निर्देश है। अगर हम इस पर ध्यान दें तो समझदारी होगी। यदि हममें से अधिकतर लोग अपनी गति धीमी कर दें, सोच-समझकर उपभोग करें, स्थानीय कारीगरों का समर्थन करें, तथा संसाधनों को पवित्र मानें और यह मानें कि संसाधन अनंत नहीं है, तो हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकेंगे जो आगे बढ़ाने लायक होगा।

एक धारणा यह है कि हम प्रकृति को बचाने के लिए यहां हैं। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है। प्रकृति को किसी बचाव अभियान की नहीं, बल्कि साझेदारी की ज़रूरत है।

हम अपने मूल्यों को कैसे व्यक्त करते हैं, जो हम खरीदते हैं, उससे हमारे विश्वासों का पता चलता है। जब आप हस्त निर्मित पर्यावरण के प्रति जागरूक वस्तुओं का चयन करते हैं, तो आप एक लेन-देन से कहीं अधिक का समर्थन कर रहे होते हैं। आप समुदायों, संस्कृतियों और संरक्षण का समर्थन कर रहे होते हैं।

यूरोपियन कमिशन के एक रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों ने ग्रह को छठी बार सामूहिक विलुप्ति की ओर धकेल दिया है, जिससे अब दस लाख प्रजातियां खतरे में हैं ।

पिछले 50 वर्षों में आधे से अधिक पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर और मछलियां लुप्त हो चुकी हैं। दुनिया भर में विलुप्त होने की दर अब मानव-पूर्व काल की तुलना में 100 से 1000 गुना अधिक है, जो डायनासोर के विलुप्त होने के बाद से सबसे बड़ी विलुप्ति घटना है। इससे हमारी खाद्य और जल सुरक्षा को खतरा है। हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ख़तरे में डालता है, हमारी अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करता है।

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति लचीलेपन का खतरा बढ़ता है – जब मानवता की संसाधन-खपत पृथ्वी की वर्ष भर में उन संसाधनों को पुनर्जीवित करने की क्षमता से अधिक हो गई है, जो इस बात का स्मरण कराता है कि आधुनिक उपभोग पद्धतियां कितनी असंवहनीय है तथा किस प्रकार ये हमारे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक दबाव डाल रही हैं।

वर्तमान में भारत को अपनी आबादी की मांग को पूरा करने के लिए अपने संसाधनों की 2.6 गुना करने की जरूरत है, जिसके कारण जंगलों का नाश हो रहा है, जैव-विविधता कम हो रही है और जलवायु में तेजी से बदलाव आ रहा है। 1.4 अरब से ज्यादा की आबादी वाला भारत, जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती खपत के कारण कई चुनौतियों का सामना कर रहा है।

क्या हम लोग ऐसा लक्ष्य बना सकते हैं जिससे हमारी मांगें धरती के द्वारा प्रदान की जा सकने वाली मांगों से मेल खाए ?   

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