रायपुर

कलेक्टर डॉ सर्वेश्वर नरेंद्र भुरे ने जिले के किसानों से अपील की है कि किसान अधिक से अधिक संख्या में फसल अवशेष प्रबंधन करें जिससे मुख्यमंत्री जी के मंशानुरूप निकटतम गौठानों में, पैरादान के माध्यम से पशुचारा उपलब्ध हो सके। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी ) ने खेतों में खरपतवार अथवा पराली जलाने पर रोक लगा रखी है। कृषि विभाग एवं जिला प्रशासन भी फसल अवशेष और पराली नहीं जलाने पर सख्त है एवं जिले में सतत निगरानी की जा रही है। धान फसल की कटाई उपरांत 1-1.5 फीट बचे हुए ठूंठ को साफ करने के लिए आग लगा दी जाती है। जिससे खेत की उर्वरा शक्ति क्षीण होती है एवं भूमि के लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही कार्बन डाइआॅक्साइड, नाइट्रस आॅक्साइड, मिथेन गैस एवं अन्य प्रकार की जहरीली गैसों से वायु प्रदूषण एवं मनुष्यों में फेफड़े की बीमारी एवं पशुओं के स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

किसी भी किसान द्वारा अपने खेत में फसल अवशेष जलाने या जलाते हुए पाये जाने पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेशानुसार उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही प्रावधानित है। फसल कटाई के पश्चात खेतों में पड़े हुए पैरे एकत्रित करने के लिए शासन द्वारा बेलर मशीन की व्यवस्था की गई है। बेलर मशीन से एकत्रित पैरे का उपयोग गौठानों में पशुओं के लिए नि:शुल्क चारा उपलब्ध कराया जा रहा है। कृषि विभाग, जिला रायपुर के उप संचालक श्री कश्यप ने बताया कि विकासखंड आरंग के श्री आर. के. वर्मा, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी द्वारा राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के प्रावधानों के तहत ग्राम चटौद / पचेड़ा के कृषक को समझाइश देकर पैरा एवं ठूंठ जलाने से रोका गया। श्री वर्मा, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी एवं सरपंच द्वारा किया गया यह प्रयास सराहनीय है एवं अन्य कृषकों को प्रेरित करने वाला है। इसी प्रकार किसानों को ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों एवं उच्च अधिकारियों द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन हेतु लगातार मार्गदर्शन दिया जा रहा है।

कृषकों को फसल अवशेष न जला कर उसका उचित प्रबंधन करने के लिए यह सुझाव दिए गए है कि फसल कटाई के बाद  जुताई कर खेत में पानी भरने से फसल अवशेष खाद में परिवर्तित हो जाते हैं जिससे अगली फसल के लिए मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। साथ ही फसल अवशेषों को एकत्र कर वेस्ट डीकम्पोजर / ट्राइकोडर्मा डालकर खाद बनाने में उपयोग किया जा सकता है जिससे रासायनिक खाद हेतु राशि के अनावश्यक व्यय को कम किया जा सकता है। फसल अवशेषों को खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी में मिलाने से मृदा संरचना में सुधार के साथ-साथ भूमि की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है। इसका उपयोग मशरूम उत्पादन के लिए किया जा सकता है और साथ ही उद्यानिकी फसलों में मल्चिंग के लिए भी  किया जा सकता है।

Source : Agency